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Moon-

चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र विशिष्ट उपग्रह है क्योंकि पूरे सौरमंडल में यही एक उपग्रह है जो सामान्य उपग्रह से बहुत बड़ा है प्राय सभी उपग्रह अपने मूल ग्रहण के आकार का आठवां भाग होते हैं जबकि चंद्रमा पृथ्वी का चौथाई है चंद्रमा का व्यास 3,475 किलोमीटर है परंतु इसकी सतह अटलांटिक महासागर की आधी जितनी भी नहीं है। इसलिए गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के छठे भाग के बराबर है।

चंद्रमा की पृथ्वी से अधिकतम दूरी 4,06,000 किलोमीटर और न्यूनतम दूरी 3,64,000 किलोमीटर है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर 27.5 दिन में और अपनी ही ध्रुव पर एक चक्कर इतने ही समय में लगता है।

हमें दिखाई देने वाला चंद्रमा का चमकने वाला भाग पहाड़ों और ऊंचे पत्थरों का पहाड़ है जो सूर्य से प्रकाश आता है गहरा दिखने वाला भाग नीचे भूमि है जिसको कभी समुद्र समझागया था और उसके अनुसार उसके नाम भी दिए गए थे यद्यपि चंद्रमा में पानी नहीं है उनका नक्षत्र से होने वाले दबाव के कारण इसमें गड्ढे बने हैं इस गोटेन का आकार अलग-अलग है समुद्र की कमी को पूरा करने के लिए चंद्रमा में ऊंची ऊंची चोटियों वाले पहाड़ है जिसमें से अधिकांश 6000 मीटर तक ऊंचे हैं। इनमें सबसे ऊंचा लिविनीश पहाड़ जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास है और जिसकी ऊंचाई 10,660 मीटर है यानी माउंट एवरेस्ट से भी ऊंची है।
चन्द्र्मा पर वायुमंडल नहीं है, क्योंकि इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति गैसों को बनाए रखने में असमर्थ है इससे बड़ी विचित्र घटना होती है वहां कोई शांति या गोली दिन एकाएक निकलता है क्योंकि ऐसा कोई वायुमंडल नहीं है जो सूर्योदय के पूर्व जल का प्रकाशित होधोनी भी नहीं है क्योंकि धोनी व्यू के माध्यम से संचालित कंपन है चंद्रमा पर तापमान बहुत अधिक होता है दिन में तापमान से बढ़ तक बढ़ जाता है और रात में घाटधोनी भी नहीं है क्योंकि धोनी वायु के माध्यम से संचालित कंपन है चंद्रमा पर तापमान बहुत अधिक होता है दिन में तापमान से बढ़ तक बढ़ जाता है और रात में घटकर -180°C हो जाता है।
सूर्य के साथ-साथ चंद्रमा भी पृथ्वी पर समुद्र में आने वाले ज्वार के लिए उत्तरदाई है। यह सूर्य की अपेक्षा अधिक निकट होने के कारण ज्वार पर अधिक प्रभाव डालता है पृथ्वी तल तक पहुंचनेे के लिए चंद्रमा के प्रकाश को केवल 1.3 सेकंड लगते हैं जबकि सूर्य की किरण को 8 मिनट 16.6 सेकंड। ज्वार के उठने के लिए अपेक्षित सौर एवं चंद्र शक्तियों में अनुपात 11:5 का है।
जुलाई में अपोलो-11 ने दो व्यक्ति को चंद्रमा की धरती पर उतर कर मानव के अंतरिक्ष में यात्रा के नए अध्याय खोला था इसने मानव को चंद्रमा की धरती पर उतरने की संभावना दी जिससे पुरानी पौराणिक कथाओं में संभव माना गया था अमेरिकी ने इसका आरंभिक सफलता को अपोलो-12, अपोलो-14, 15, 16 और 17 के माध्यम से जारी रखा है। रूस ने लूना-16 ( 12 सितम्बर, 1970 ) को बिना मानव के भेजो। लूना-16 ने चंद्रमा की मिट्टी के नमूने किए और पृथ्वी पर 24 सितम्बर, 1970 को वापस आ गया। लूना अपने साथ को ले गया जिसे चन्द्रमा कि धरती पर चलाया गया।


लूना-16
चंद्रमा पर मानव के उतरने और इन सभी मानव संचालित तथा लूना-16 जैसे बिना मानव के भेजें गए अंतरिक्ष वाहनों ने चंद्रमा की पहेली को अब भी हाल नहीं किया है। चंद्रमा की उत्पत्ति तथा पृथ्वी के साथ उसका संबंध-दंपत्ति, पुत्री, बहन – आप भी प्रश्न बने हुए हैं। फिर भी अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाई गई पुरानी से पुरानी चट्टानों और मिट्टी के नमूनों ने स्पष्ट कर दिया है कि चाँद भी उतरना ही पुराना है जितनी पृथ्वी और यह लगभग 460 करोड़ वर्ष पूर्व बना था। चंद्रमा के रूप की सबसे अधिक उल्लेखनीय विशेषता उसकी सतह पर पाए जाने वाले गड्ढे कि है। ये कई आकार के हैं- 1,000 किलोमीटर व्यास के गोलाकार विशाल बेसिनो ने लेकर कुछ मीटर व्यास वाले गड्ढे युगो से चली उल्का-तारों की वर्षा से बने हैं।
पहले-पहला अपोलो 11 और 12 जहां उतरे वह जगह भी मेरा-क्षेत्र। यहां से मिली चट्टानें पृथ्वी पर पाए जाने वाली ज्वालामुखी चट्टानों की तरह लावा है। आश्चर्यजनक बात तो इसमें टाइटेनियम की मात्रा अत्यधिक प्रतिशत में पाया जाना हैं। पृथ्वी के अनेकों चट्टानों में केवल एक प्रतिशत टाइटेनियम पाया जाता है जबकि चांद की चट्टानों में इससे 10 गुना अधिक टाइटेनियम है। इसमे पृथ्वी के लिए अज्ञात धातु भी मिली है। इनमें से एक का नाम आर्मलकोलाइड नाम रखा गया है यह नाम अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग के नाम पर रखा।

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